दूर-दूर तक कोई पेड़ नहीं, कोई पक्षी नहीं, बस बदबू ही बदबू। यह नोएडा का सेक्टर-150 है, जो ग्रेटर नोएडा से सटा हुआ है। यहीं है एक गांव मोमनथाल। उससे आगे कच्ची, रेतीली पगडंडी पर कोई तीन किलोमीटर चलने के बाद एक धारा दिखाई देती है। कुछ दूर बाद दोपहिया वाहन भी नहीं जा सकते। अब पगडंडी भी नहीं है, जाहिर है कि वर्षो से कभी कोई उस तरफ आया ही नहीं होगा। सीधे हाथ पर शांत यमुना का प्रवाह और बायीं तरफ से आता गंदा, काला पानी, जिसमें भंवरें उठ रही हैं, गति भी तेज है। यह है हिंडन। जहां तक आंखें देख सकती हैं, गाढ़ी हिंडन को खुद में समाने से रोकती दिखती है यमुना। विकास के प्रतिफल का यह दृश्य राजधानी दिल्ली की चौखट पर है। इसके आसपास देश की सबसे शानदार सड़क, शहरी स्थापत्य, शैक्षिक संस्थान और बाग-बगीचे हैं। दो महान नदियों का संगम आखिर इतना नीरस, उदास और उपेक्षित क्यों है?इसे देखकर पाठ्य-पुस्तकों में दशकों से छप रहे उन शब्दों की प्रामाणिकता पर शक होने लगता है, जिनमें कहा जाता रहा है कि मानव सभ्यता का विकास नदियों के किनारे हुआ और नदियों के संगम स्थल को बेहद पवित्र माना जाता है। धार्मिक आख्यान कहते हैं कि हिंडन नदी पांच हजार साल पुरानी है। मान्यता है कि इस नदी का अस्तित्व द्वापर युग में भी था और इसी नदी के पानी से पांडवों ने खांडवप्रस्थ को इंद्रप्रस्थ बना दिया था। जिस नदी का पानी कभी लोगों की जिंदगी को खुशहाल करता था, आज उसी नदी का पानी लोगों की जिंदगी के लिए खतरा बन गया है। बीते 20 साल में हिंडन इस कदर प्रदूषित हुई कि उसका वजूद लगभग समाप्त हो गया है। गाजियाबाद जिले के करहेड़ा गांव से आगे बढ़ते हुए इसमें केवल औद्योगिक उत्सर्जन और विशाल आबादी की गंदगी ही बहती दिखती है। छिजारसी से आगे पर्थला खंजरपुर के पुल के नीचे ही नदी महज नाला दिखती है। कुलेसरा व लखरावनी गांव पूरी तरह हिंडन के तट पर हैं। इन दो गांवों की आबादी दो लाख पहुंच गई है। अधिकांश सुदूर इलाकों से आए मेहनत-मजदूरी करने वाले। उनको हिंडन घाट की याद सिर्फ दीपावली के बाद छठ पूजा के समय आती है। तब घाट की सफाई होती है, इसमें गंगा का पानी नहर से डाला जाता है। कुछ दिनों बाद फिर यह नाला बन जाती है। अपने अंतिम 55 किलोमीटर में सघन आबादी के बीच से गुजरती इस नदी में कोई जीव, मछली नहीं है। इसके पानी में ऑक्सीजन की मात्र शून्य है। हाल ही में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण यानी एनजीटी के आदेश पर हिंडन नदी के किनारे बसे गाजियाबाद, मेरठ, बागपत, शामली, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर जनपद के करीब 154 गांवों के 31 हजार हैंडपंपों को 21 अक्तूबर तक उखाड़ने के निर्देश दिए गए हैं। एनजीटी ने अपने एक अध्ययन से पुख्ता किया कि अधिकांश हैंडपंपों का पानी भारी धातुओं से दूषित है और संदेह है कि सहारनपुर, शामली और मेरठ जिले के लगभग 45 तरह के उद्योग नदी के जल में आर्सेनिक, पारा जैसे जानलेवा रसायन डाल रहे हैं। अभी इसी साल मई में दिल्ली में यमुना नदी को निर्मल बनाने के लिए 1,969 करोड़ रुपये के एक्शन प्लान को मंजूरी दी गई है, जिसमें यमुना में मिलने वाले सभी सीवरों व नालों पर प्लांट लगाने की बात है। मान भी लिया जाए कि दिल्ली में यह योजना कामयाब हो गई, पर वहां से दो कदम दूर निकलकर इसका मिलन जैसे ही हिंडन से होगा, ये सैकड़ों करोड़ रुपये बर्बाद होते दिखेंगे। हिंडन के तट पर बसा समाज इसके प्रति बेहद उदासीन रवैया रखता है। ये अधिकांश लोग बाहरी हैं और इस नदी के अस्तित्व से खुद के जीवन को जोड़कर देख नहीं पा रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि हिंडन के तटों पर आकर बसे लोग इस नदी को नदी के रूप में पहचानें, इसके जहर होने से उनकी जिंदगी पर होने वाले खतरों के प्रति गंभीर हों, इसके तटों की सफाई व सौंदर्यीकरण पर काम हो। सबसे बड़ी बात यह कि जिन दो महान नदियों का संगम बिल्कुल गुमनाम है, वहां कम से कम घाट, पहुंचने का मार्ग, संगम स्थल के दोनों ओर वृक्षारोपण जैसे तात्कालिक कार्य किए जाएं। हिंडन की मौत एक नदी या जलधारा का अंत नहीं, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता, संस्कृति और संस्कार का भी अवसान होगा। (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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